राजस्थानराज्य

बाड़मेर की पहाड़ी पर विराजतीं मां जोगमाया, आस्था और इतिहास से जुड़ा है 16वीं सदी का गढ़ मंदिर

 बाड़मेर
रेगिस्तान की धरती पर आस्था का एक ऐसा शिखर है, जहां पहुंचते ही श्रद्धा और इतिहास का संगम दिखाई देता है। बाड़मेर शहर के सबसे पुराने देवी मंदिरों में शामिल यह धाम पीढ़ियों से लोगों की आस्था का केन्द्र बना हुआ है।

यहां आने वाले भक्त मां के दर्शन कर परिवार की खुशहाली और देश की रक्षा की कामना करते हैं। सैनिक भी मां की आरती में शामिल होकर भवानी से देश की सुरक्षा की अरदास करते हैं।

गढ़ की पहाड़ी पर बसा आस्था का इतिहास
बाड़मेर के पुराने इतिहास की कड़ियां जूना बाड़मेर से जुड़ी हैं। जानकारों के अनुसार, जूना बाड़मेर के बाद बाहड़मेर बसा, जिसे बाहड़राव ने बसाया था। जूना बाड़मेर शहर से करीब 25 किलोमीटर दूर स्थित है। इसके बाद 16वीं सदी में रावत भीमा ने ऊंची पहाड़ी पर गढ़ मंदिर का निर्माण करवाया। जोगमाया के नाम से प्रसिद्ध यह मंदिर समय के साथ शहर की धार्मिक पहचान बन गया।

जोगमाया मंदिर में की गई सजावट
पहाड़ी की तलहटी में पुराना बाड़मेर बसा था। एक ओर सोन तालाब, तो दूसरी ओर कारेली नाडी और नरगासर तालाब इसकी बसावट को खास बनाते थे। पुरानी बावड़ियां और आसपास फैली पहाड़ियां इस क्षेत्र की प्राकृतिक सुंदरता को बढ़ाती थीं। सोन तालाब के पास से सूजेश्वर की ओर फैली पहाड़ियों का दृश्य आज भी इस भूभाग की विशिष्ट पहचान है।

जोशियों का वास, ढाणी बाजार, जीनगरों की बस्ती और मोक्षमार्ग पुराने बाड़मेर की बसावट के प्रमुख हिस्से थे। शहर की सीमा शहर कोतवाली तक मानी जाती थी। पुराने लोगों के अनुसार, कोतवाली क्षेत्र में घुड़साल हुआ करती थी। गांधी चौक के सामने स्थित ओल्ड स्कूल भी अंग्रेजों के जमाने का बताया जाता है। इसके आगे रेलवे स्टेशन तक का इलाका कभी वीरान रहता था।

आस्था के साथ भरोसे का ठिकाना बना
गढ़ मंदिर की आस्था केवल धार्मिक परंपराओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका जुड़ाव शहर के कठिन दौर से भी रहा है। रावत भीमा की वंश परंपरा से जुड़े रावत त्रिभुवनसिंह बताते हैं कि वर्ष 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान जब बाड़मेर शहर पर बमबारी हुई, तब लोग सुरक्षा की आस में मंदिर की सीढ़ियों पर आकर बैठते थे।

गढ़ मंदिर स्थिति मंदिर में विराजीं जोगमाया
पहाड़ी पर स्थित मंदिर लोगों के लिए आस्था के साथ भरोसे का ठिकाना भी बना। मंदिर परिसर में नागणेच्यां माता का मंदिर भी है। इसके पास बंकर बनाए गए थे। पहाड़ी की संकरी सीढ़ियों और आसपास के पहाड़ी क्षेत्र के कारण लोगों को यहां आसरा मिलता था। युद्ध की उन यादों के बीच मां के प्रति लोगों की श्रद्धा और विश्वास आज भी कायम है।

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